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महिमा प्रयागराज

प्रथमं तीर्थराजं तु प्रयागाख्यं सुविश्रुतम् ।
कामिकं सर्वतीर्थानां धर्मकामार्थमोक्षदम् ।।
           तीर्थराज प्रयाग का नाम स्मरण करने से ही मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।वह पूर्ण निष्पाप होकर मोक्षपद का अधिकारी बन जाता है।इनके दर्शन ; नाम-संकीर्तन अथवा यहाँ की मिट्टी का स्पर्श करने से ही मनुष्य पाप-मुक्त हो जाता है।यहाँ पाँच कुण्ड हैं।इन्हीं कुण्डों के बीच मे गंगा जी प्रवाहित हो रही हैं।इसलिए प्रयाग मे प्रवेश करते ही मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।गंगा तो वैसे ही पतित पावनी हैं।इनका नाम स्मरण करने से ही मनुष्य पाप मुक्त हो जाता है।यदि कोई प्रयाग आकर गंगा का दर्शन ; स्नान और जलपान कर ले तो वह यावज्जीवन मंगलमय स्थिति मे रहता है।उसकी सात पीढ़ियाँ तर जाती हैं।जो व्यक्ति पूर्ण संयम नियम के साथ संगम मे स्नान करता है ; वह पापमुक्त होकर समस्त मनोरथों को प्राप्त कर लेता है।

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