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लोभ ओर आज्ञान

एक निर्धन व्यक्ति नित्य लक्ष्मीनारायण की पूजा करता था. लक्ष्मी जी ने उसे एक अंगूठी भेंट दी जिससे जो मांगता मिल जाता. लक्ष्मीकृपा से वह साधन संपन्न हो गया. एक दिन नगर में तूफ़ान के साथ बारिश होने लगी. लोग इधर-उधर भागने लगे. तभी एक बुढ़िया उसके बंगले में आई. उसे देख वह व्यक्ति गरज कर बोला- ऐ बुढ़िया कहां चली आ रही है बिना पूछे. बुढ़िया ने कहा- कुछ देर तुम्हारे यहां रहना चाहती हूं. मेरा कोई आसरा नहीं है. इतनी तेज बारिश में मैं कहां जाऊंगी? थोड़ी देर की ही तो बात है. लेकिन उसकी किसी भी बात का असर उस व्यक्ति पर नहीं पड़ा. जैसे ही सेवकों ने उसे द्वार से बाहर किया. वैसे ही जोरदार बिजली कौंधी. देखते ही देखते उस व्यक्ति का मकान जलकर खाक़ हो गया. उसके हाथों की अंगूठी भी गायब हो गई. सारा वैभव पल भर में राख के ढेर में बदल गया. उसने आंख खोल कर जब देखा,, तो सामने लक्ष्मी जी खड़ी थीं. चरणों में गिर पड़ा. देवी बोलीं- तुम इस योग्य नहीं हो.ए जहां निर्धनों का सम्मान नहीं होता,, मैं वहां निवास नहीं कर सकती. कहकर लक्ष्मी जी आंखों से ओझल हो गई!

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